Thursday, April 5, 2012

tumhara hona

तुम्हारा होना 
एक जीवित एहसास ,
तुम्हारा ना होना 
एहसासों का गुम हो जाना 
बीहड़ो में ,
या फिर रेत के बवंडर में ,
फिर दूर तक सन्नाटा होता है ।
नही ....
शोर होता है ,
यादों का बीहड़ शोर 
जो परे चल जाता है 
एहसासों के ।
और  यादें 
दर्द में तब्दील हो जाती हैं ।
     कंचन @ 

Kanchan Neeraj: entjar prem ka vistar hai.

Kanchan Neeraj: entjar prem ka vistar hai.: मै दो अंशो में विभक्त हो गयी हू  एक अंश सजीव सा  मेरे समीप है । दूसरा हवाओ  में  कहीं गुम गया है  और हवाएं मुझे जला रही हैं।   मैं विस्मित ह...

entjar prem ka vistar hai.

मै दो अंशो में विभक्त हो गयी हू
 एक अंश सजीव सा 
मेरे समीप है ।
दूसरा हवाओ  में 
कहीं गुम गया है 
और हवाएं मुझे जला रही हैं।
  मैं विस्मित हूँ 
सम्पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण हूँ 
फटी हुयी  सी  
दर्द बन कर टीस रही हैं यादें 
और इंतजार उदास दुपहरिया सी 
पसरी  हुयी है आँगन में ।
प्रेम दो दिलों को जोड़ देता है 
ऐसे जैसे रात दिन से जुडी है ,
फ़ूल शाख से जुडी है ,
वर्षा बादल से जुडी है ,
नदिया जल से जुडी है ।
यादें प्रेम का अंतर्नाद है ,
विछोह प्रेम का विलाप है ,
इंतजार प्रेम का विस्तार है ।
मैं प्रेम को जी रही हूँ ।
कंचन @  

Monday, March 12, 2012

Kanchan Neeraj: vivshta

Kanchan Neeraj: vivshta:  किसने तय कर दिए दायरे    बना दिए मानक  घेर दिया एक गोल घेरा  बिना कोनो का  लुढ़कती रहती है इच्छाएं  इसी में इधर-उधर ,गोल- गोल । क्या वजह रह...

Kanchan Neeraj: vivshta

Kanchan Neeraj: vivshta:  किसने तय कर दिए दायरे    बना दिए मानक  घेर दिया एक गोल घेरा  बिना कोनो का  लुढ़कती रहती है इच्छाएं  इसी में इधर-उधर ,गोल- गोल । क्या वजह रह...

vivshta

 किसने तय कर दिए दायरे 
  बना दिए मानक 
घेर दिया एक गोल घेरा 
बिना कोनो का 
लुढ़कती रहती है इच्छाएं 
इसी में इधर-उधर ,गोल- गोल ।
क्या वजह रही होगी 
मिट तो सकती थी लकीरे 
फिर क्यों फेर लिया गया चेहरा ,
क्या है रहस्य 
क्या स्वीकार्यता संभावनाओं का अंत नही कर देती 
विवशता 
इतनी प्रबल नही होती ।
की हाथ पर हाथ धरे बैठ जाया जाये 
और चुप्पी साध ली जाये ,
सारी संभावनाओ के खिलाफ
गर्दन तक खिंच कर रेशमी लिहाफ 
भुला   दिया जाये
आजादी की गंध को
और एडियाँ घिसते बिता दी जाये 
सोने के पिंजरे में कैद  हो कर सारी जिन्दगी ।         
@कंचन             

Tuesday, March 6, 2012

kvita

 कविता 
 केवल सुखों का दस्तावेज नही है 
 कुछ दुःख भी है इनमे 
 सुख के साथ 
 सारे रंग होते है यहाँ 
 अपने-अपने रंग के साथ ।
कुछ स्याह-सुनहरी यादें 
कुछ काले-उजले पल 
हर वो क्षण  वो भाव जिनमे 

जीता है मानव    
 मरता भी है ।क्यूँ की जीवन शाश्वत है 
सुख-दुःख भी शाश्वत है ।
 गुथें है एक ही धागे में 
कुछ आगे कुछ पीछे 
कुछ नन्हे  कुछ बड़े 
पर सब अपनेपन के साथ है 
अपनी जगह घेरे हुए 
कम या तो ज्यादा ।
   @kanchan

prem ki kvitayen

  मै देर तक लिखती रहूंगी
  प्रेम की कविताएँ
  क्यूँ की प्रेम
  कहीं भिन जाता है
  रगों में और एकाकार हो जाती है
  दो धुर विरोधी आत्माएं ,
  एक नर-एक मादा।
  जब प्रेम सीन्झता है
  आत्मा तक
  फिर निराकार हो जाते है
  सारे अंतर्विरोध और
एक अनोखा संगीत पैदा होता  है

    साझेदारी का ।
प्रेम व्याप्त है जड़ -चेतन जगत में
जैसे धड़कन जीवन में
इसीलिए
प्रेम की कविताएँ
मै देर तक रचती रहूंगी ।
  @कंचन 

Monday, January 30, 2012

nari albeli

सरसों के खेतों बीच खड़ी
वह नारी अलबेली 
पहने नीली- नीली साडी 
चहुँ  ओर दिखे है हरियाली
 
 पीले- पीले फूल खिले 
मतवाली पवन चले 
लहराता नीला आँचल 
झक नीले आकाश तले
दूर खड़े तरु देखे  कौन ?
यह नारी अलबेली मौन 
मंद-मंद मुस्काती है 
सरसों के फूल खिलाती है ।
     @kanchan

aadha aakash

विशाल समन्दर है 
और
सुर्ख लाल आकाश 
दूर कहीं से मौन 
चला आ रहा कोई जहाज 
सूर्य के सम्मुख खड़ा है 
डूबता सूरज 
आधा आकाश आधा समन्दर में 
बह रहा है ।
लौटते  पंछी  घरों को मचा रहे  कलरव 
दे रहा संकेत सांझ 
निशा के आगमन का ।
  @kanchan