Monday, May 14, 2012
Kanchan Neeraj: भेडिये
Kanchan Neeraj: भेडिये: भेडिये घूम रहे हैं गोश्त की तलाश में, यहाँ-वहाँ चारों तरफ निगाहें बहुत पैनी हैं इनकी ओढ रखी है सामाजिकता की चादर पहचानना भी है ...
भेडिये
भेडिये घूम रहे हैं
गोश्त की तलाश में,
यहाँ-वहाँ चारों तरफ
निगाहें बहुत पैनी हैं इनकी
ओढ रखी है सामाजिकता की चादर
पहचानना भी है मुश्किल.
जहाँ दिखती है
थोडी सी झिर्री ,सुराख,
कोई खुली खिडकी
ताजी हवा की खातिर
घुस जाना चाहते हैं भेडिये
तोड कर बेशर्मी की हदें,
और बतलाते हैं खुद को सफेदपोश.
आधुनिकता के नुमाइन्दे
दकियानूसी करार देते हैं ये
प्रेम बंधन,नैतिकता,विश्वास को
नंगी सभ्यता के ये नंगे पैरोकार
लिपटे रहते हैं देर तक छलावे के लिबास में.
@ kanchan
Tuesday, May 1, 2012
Kanchan Neeraj: मां और तन्हाई
Kanchan Neeraj: मां और तन्हाई: माँ चुनती है चावल साथ में बुनती है विचार , आज फिर बहुत काम है , बिटिया के स्कूल जाना है , घर का राशन लाना है , साथ ही...
मां और तन्हाई
माँ
चुनती है चावल
साथ में
बुनती है विचार ,
आज फिर बहुत काम है ,
बिटिया के स्कूल जाना है ,
घर का राशन लाना है ,
साथ ही
सींझ्ना है समय को अपने भीतर ।
माँ चूल्हे पर रख देती है
बटुली और तैयार हो जाता है चावल ,
फिर ख्याल के झरोखे खुलने लगते हैं ,
दर्द भी कुलबुलाने लगता है ,
तन्हाईयों के बीच
गुजर जायेगा एक और दिन
कैसे?कंधे पर सलीब रख कर
जीना होता है
देर तक समय के साथ
गुफ्तगू करते हुए ।
माँ और तनहाई का रिश्ता
अटूट है ,
माँ चावल से बतियाती है
और फिर खुद ही
एक पलटता हुआ पन्ना बन जाती है
किसी डायरी का
जिसमे रखे होते है
तनहाईयों के दस्तावेज
कुछ मासूम से लम्हे
बचपन के भी
जिनसे माँ खेलती है .
कुछ यादें प्रेम की
जिन्हें माँ कभी-कभी
ओढ़ लेती है सावन में ।
और फिर माँ
तनहाईयों को समेटते हुए
रात्र के लिहाफ में घुस जाती है
सुबह होने तक ।
माँ देर तक समय को जीती है ।
@कंचन
Tuesday, April 17, 2012
Kanchan Neeraj: दो मौसम
Kanchan Neeraj: दो मौसम: देखा दरख़्त की छाँव में , दो मौसमों को एक साथ बैठे हुए , एक बासंती दूसरा शरद . दूरियां मौसमी थीं जिन्हें दिलों ने नही स्वीकारा और साथ ह...
दो मौसम
देखा दरख़्त की छाँव में ,
दो मौसमों को एक साथ बैठे हुए ,
एक बासंती दूसरा शरद .
दूरियां मौसमी थीं
जिन्हें दिलों ने नही स्वीकारा
और साथ हो लिए .
मिट गयी दूरियां जब
साझा हो गये सारे ख्वाब
पेड़ की छाँव तले
कुछ कसमे कुछ वादे हुए .
और फिर मौसम बदला
बासंती लौट गयी अपने घर
जो कहीं दूर पहाड़ों पर था ,
जहाँ जाना कठिन था ,
रास्ता दुर्गम था ,
कंटीली झाड़ियाँ थीं ,
चट्टानें थीं और कुछ निगाहे थीं
जो आग उगलती थीं .
प्रेम जिनके लिए वर्जित था
और मैदानी विजातीय थे .
बड़ा अहम होता है
प्रेम से भी ज्यादा अहम ,
कुछ जलते हुए सवाल .
दब कर रह जाती हैं सिसकियाँ
घुटी रह जाती है आवाज
पहाड़ों में गूंजती है विरह की तानें
चट्टानें और भी सख्त हो जाती हैं .
कंटीली झाड़ियों पर पीले रंग के फूल नही खिलते हैं ,
जिनमे होती है खुशबु और पराग .
शरद अड़ जाता है चट्टानों के आगे ,
पर चट्टान पिघलते नहीं हैं ,
मौसम की तरह वे बदलते नहीं हैं .
सख्त जीवन, जीवन से भी सख्त उसूल ,
उसूलों के लिए मिटा दिए जाते हैं
प्यार के फूल .
किसी दरख्त पर लटका दिया जाता है
दो मौसमों को
और सुना दिया जाता है फरमान ,
प्रेम वर्जित है ,
चट्टानों के रंग एक से होते हैं ,
केवल स्याह .
ख्वाब चिंदी-चिंदी हो कर
पहाड़ी हवाओं में गुम हो जाते हैं .
@कंचन
Thursday, April 12, 2012
Kanchan Neeraj: tumhare bin
Kanchan Neeraj: tumhare bin: तुम शब्द हो , जो मेरे भावों को व्यक्त करते हो तुम्हारे बिन मैं अव्यक्त रह जाती हूँ . तुम सुगंध हो जो बसती है मेरी देह में जगाती ह...
tumhare bin
तुम शब्द हो ,
जो मेरे भावों को व्यक्त करते हो
तुम्हारे बिन
मैं अव्यक्त रह जाती हूँ .
तुम सुगंध हो
जो बसती है मेरी देह में
जगाती है तृष्णा
तुम्हारे बिन
मै रसहीन हो जाती हूँ.
तुम रंग हो मेरे जीवन में
फूलों की तरह ,भांति -भांति के,
तुम्हारे बिन मैं
रंगहीन हो जाती हूँ .
मेरे प्रिय ,
तुम श्वांस हो मेरी ,
तुम्हारे बिन
मैं निर्जीव हो जाती हूँ .
@kanchan
Thursday, April 5, 2012
Kanchan Neeraj: tumhara hona
Kanchan Neeraj: tumhara hona: तुम्हारा होना एक जीवित एहसास , तुम्हारा ना होना एहसासों का गुम हो जाना बीहड़ो में , या फिर रेत के बवंडर में , फिर दूर तक सन्नाटा होता है ...
Kanchan Neeraj: tumhara hona
Kanchan Neeraj: tumhara hona: तुम्हारा होना एक जीवित एहसास , तुम्हारा ना होना एहसासों का गुम हो जाना बीहड़ो में , या फिर रेत के बवंडर में , फिर दूर तक सन्नाटा होता है ...
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