Thursday, April 12, 2012

Kanchan Neeraj: tumhare bin

Kanchan Neeraj: tumhare bin:  तुम शब्द हो ,  जो मेरे  भावों  को व्यक्त करते हो   तुम्हारे बिन   मैं अव्यक्त रह जाती हूँ .  तुम सुगंध हो  जो बसती  है मेरी देह में जगाती ह...

tumhare bin

 तुम शब्द हो ,
 जो मेरे  भावों  को व्यक्त करते हो 
 तुम्हारे बिन 
 मैं अव्यक्त रह जाती हूँ .
 तुम सुगंध हो 
जो बसती  है मेरी देह में
जगाती है तृष्णा 
तुम्हारे बिन 
मै रसहीन हो जाती हूँ.
तुम रंग हो मेरे जीवन में 
फूलों की तरह ,भांति -भांति के, 
तुम्हारे बिन मैं 
रंगहीन हो जाती हूँ .
मेरे प्रिय ,
तुम श्वांस हो मेरी ,
तुम्हारे बिन 
मैं निर्जीव हो जाती हूँ .
   @kanchan

Thursday, April 5, 2012

Kanchan Neeraj: tumhara hona

Kanchan Neeraj: tumhara hona: तुम्हारा होना  एक जीवित एहसास , तुम्हारा ना होना  एहसासों का गुम हो जाना  बीहड़ो में , या फिर रेत के बवंडर में , फिर दूर तक सन्नाटा होता है ...

Kanchan Neeraj: tumhara hona

Kanchan Neeraj: tumhara hona: तुम्हारा होना  एक जीवित एहसास , तुम्हारा ना होना  एहसासों का गुम हो जाना  बीहड़ो में , या फिर रेत के बवंडर में , फिर दूर तक सन्नाटा होता है ...

tumhara hona

तुम्हारा होना 
एक जीवित एहसास ,
तुम्हारा ना होना 
एहसासों का गुम हो जाना 
बीहड़ो में ,
या फिर रेत के बवंडर में ,
फिर दूर तक सन्नाटा होता है ।
नही ....
शोर होता है ,
यादों का बीहड़ शोर 
जो परे चल जाता है 
एहसासों के ।
और  यादें 
दर्द में तब्दील हो जाती हैं ।
     कंचन @ 

Kanchan Neeraj: entjar prem ka vistar hai.

Kanchan Neeraj: entjar prem ka vistar hai.: मै दो अंशो में विभक्त हो गयी हू  एक अंश सजीव सा  मेरे समीप है । दूसरा हवाओ  में  कहीं गुम गया है  और हवाएं मुझे जला रही हैं।   मैं विस्मित ह...

entjar prem ka vistar hai.

मै दो अंशो में विभक्त हो गयी हू
 एक अंश सजीव सा 
मेरे समीप है ।
दूसरा हवाओ  में 
कहीं गुम गया है 
और हवाएं मुझे जला रही हैं।
  मैं विस्मित हूँ 
सम्पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण हूँ 
फटी हुयी  सी  
दर्द बन कर टीस रही हैं यादें 
और इंतजार उदास दुपहरिया सी 
पसरी  हुयी है आँगन में ।
प्रेम दो दिलों को जोड़ देता है 
ऐसे जैसे रात दिन से जुडी है ,
फ़ूल शाख से जुडी है ,
वर्षा बादल से जुडी है ,
नदिया जल से जुडी है ।
यादें प्रेम का अंतर्नाद है ,
विछोह प्रेम का विलाप है ,
इंतजार प्रेम का विस्तार है ।
मैं प्रेम को जी रही हूँ ।
कंचन @  

Monday, March 12, 2012

Kanchan Neeraj: vivshta

Kanchan Neeraj: vivshta:  किसने तय कर दिए दायरे    बना दिए मानक  घेर दिया एक गोल घेरा  बिना कोनो का  लुढ़कती रहती है इच्छाएं  इसी में इधर-उधर ,गोल- गोल । क्या वजह रह...

Kanchan Neeraj: vivshta

Kanchan Neeraj: vivshta:  किसने तय कर दिए दायरे    बना दिए मानक  घेर दिया एक गोल घेरा  बिना कोनो का  लुढ़कती रहती है इच्छाएं  इसी में इधर-उधर ,गोल- गोल । क्या वजह रह...

vivshta

 किसने तय कर दिए दायरे 
  बना दिए मानक 
घेर दिया एक गोल घेरा 
बिना कोनो का 
लुढ़कती रहती है इच्छाएं 
इसी में इधर-उधर ,गोल- गोल ।
क्या वजह रही होगी 
मिट तो सकती थी लकीरे 
फिर क्यों फेर लिया गया चेहरा ,
क्या है रहस्य 
क्या स्वीकार्यता संभावनाओं का अंत नही कर देती 
विवशता 
इतनी प्रबल नही होती ।
की हाथ पर हाथ धरे बैठ जाया जाये 
और चुप्पी साध ली जाये ,
सारी संभावनाओ के खिलाफ
गर्दन तक खिंच कर रेशमी लिहाफ 
भुला   दिया जाये
आजादी की गंध को
और एडियाँ घिसते बिता दी जाये 
सोने के पिंजरे में कैद  हो कर सारी जिन्दगी ।         
@कंचन